शुक्रवार, 23 नवंबर 2018

बेदर्द जिंदगी

मेरे पास अब केवल तुम्हारी यादें बची हैं
अब मैं यादों के सहारे ही जिए जा रहा हूँ।

मेरी जान तो तुम्हारे संग  ही  निकल गई
अब तो बस जिंदगी को घसीटे जा रहा हूँ।

शोक सागर पर खड़ा कर दिया तुमने मुझे
अब तो मन में कसक लिए जिए जा रहा हूँ।

 तुम्हारे बिना विरान हो गई मेरी जिंदगी
   अब तो हर सांस में दर्द जिए जा रहा हूँ।

जीवन तो वही था जो तुम्हारे संग जीया
अब तो रातें तारे गिन-गिन काट रहा हूँ।

मैं भूल गया प्यार भरे गीतों को लिखना     
 अब तो दर्द भरे गीत ही लिखे जा रहा हूँ।      

अनुभूति

मेज के सामने बैठा
निस्पंद झांक रहा हूँ
मैं अतीत में

मेरे मानस पटल पर
उतरने लगी है
तुम्हारी यादें

उभरने लगी हैं तस्वीरें
बल्कि पूरा का पूरा
परिदृश्य

बालों को गर्दन के पीछे
समेटती तुम खड़ी हो
मेरे पास

तुम्हारे बदन की
संदली सुगंध
फ़ैल रही है चहुँ ओर

अपनी गर्दन पर
महसूस कर रहा हूँ तुम्हारी
साँसों का गुदगुदा स्पर्श

तुम पढ़ रही हो मेरी लिखी 
कविता की एक-एक पंक्ति
और कह रही हो 
वाह! वाह ! वाह !

सब कुछ
पहले जैसा ही 
स्मरण हो रहा है आज  

लेकिन मेरा बढ़ा हाथ
नहीं छू पा रहा है
तुम्हारा गात।

मेरे मन की कौन सुनेगा

  हर दम तेरी आती यादें
    मन में उमड़े सारी बातें    
    तन्हाई के इस जीवन में  
कौन प्यार की बात करेगा     

  मेरा दिल अब टूट गया है                                                       
   मेरे मन की कौन सुनेगा।                                                       

  मैं दुःख के दरिया में जीता   
    अपने अश्रु जल को पीता   
 जीवन की इस अर्द्धरात्रि में        
  दीपोत्सव अब कौन करेगा  

                                            मेरा दिल अब टूट गया है 
                                             मेरे मन की कौन सुनेगा।    

     सोते-उठते तुम्हें पुकारुं         
 सपनों में अब तुम्हें निहारुं       
   कैसे अब जीवन काटूंगा       
  इसकी चिंता कौन करेगा     

                                             मेरा दिल अब टूट गया है 
                                              मेरे मन की कौन सुनेगा।     

   मेरे सारे ख्वाब थे तुमसे       
   आँखों में सपने थे तुमसे     
   मेरी जीवन की नैया को     
   कौन खेवैया पार करेगा   

                                             मेरा दिल अब टूट गया है
                                              मेरे मन की कौन सुनेगा।        

रंग भरे जिन्दगी में

तुमसे बिछुड़ मेरी प्रीत टूट गई जिन्दगी से        
तुम आओ तो फिर से नेह जगे जिन्दगी में।    

पतझड़ का मौसम छा गया मेरी जिन्दगी में    
     तुम आओ तो फिर से बसंत खिले ज़िन्दगी में।            

सम्भाल रखें हैं मैंने टूटी माला के मनके        
तुम आओ तो फिर से सजाए जिन्दगी में।                        

                                               मुझे हर ख़ुशी मिल भी जाए तो क्या होगा
                                               अगर तुम्हारा  साथ नहीं मिले जिन्दगी में।         

 मुझे और कुछ नहीं चाहिए इस जिन्दगी में                                                                                                  
 अगर तुम फिर हमसफ़र बनो  जिन्दगी में।            

    मेरी ये कविताए बंदनवार है प्रतीक्षा की       
   तुम आओ तो फिर से रंग भरे जिन्दगी में।    

तुम संगदिल हो बेदिल नहीं

आज मैंने सूरज से पूछा--
रोज सुबह वो तुम्हें
अर्ध्ये दिया करती थी
आज मुझे बताओ
वो अब कैसी है ?
सूरज ने कहा -वो अच्छी है
और चला गया पहाड़ों के पीछे।

आज मैंने चाँद से पूछा--
तुम्हें देख-देख वो रोज
अपनी पोते-पोतियों को लोरियाँ
सुनाया करती थी
आज मुझे बताओ
वो अब कैसी है ?
चाँद ने कहा - वो अच्छी है
और चला गया बादलों के पीछे।

आज मैंने हवाओं से पूछा--
तुम रोज उसके आँचल से
खेला करती थी
आज मुझे बताओ
वो अब कैसी है ?
हवाओं ने कहा - वो अच्छी है
और चली गई पेड़ों से गुनगुनाने।

आज मैंने बादलों से पूछा--
तुम तो उसके पास से आते हो
आज मुझे बताओ
वो कैसी है ?
बादलों ने कहा - वो अच्छी है
और चले गए आकाश को चूमने।

मैंने सबसे कहा-
तब मुझे भी ले चलो
उस के पास
कोई भी तैयार नहीं हुवा
मुझे ले चलने तुम्हारे पास

मैंने तारों की पंचायत में
फ़रियाद लगाईं
चांदनी से सिफारिश करवाई
जंगल, पहाड़, नदियां से प्रार्थना की
लेकिन कोई सुनाई नहीं हुई

मुझे पता है
तुम मेरे बिना
खुश रह ही नहीं सकती
तुम संगदिल हो बेदिल नहीं।


तुम जो बिछुड़ गई

मधुवन  ही  वीरान  हो गया,   तुम  जो चली गई 
अश्क मेरी आँखों से ढलते, तुम जो बिछुड़ गई।

                                                          मंजिलें अब जुदा हो गई, अंजानी अब राह हुई                                                              जिंदगी अब दर्द बन गई, तुम जो बिछुड़ गई।

खाली-खाली दिल रहता, एक उदासी गहरी छाई
यादें अब  तड़पाती  मुझको, तुम जो बिछुड़ गई।

साथ जियेंगे साथ मरेंगे, हमने कसमें थी खाई 
गीत  अधूरे रह गए मेरे,  तुम जो बिछुड़ गई।

सपने मेरे सपने रह गए,ऑंखें हैं अब भरी-भरी
टूट पड़ा है पहाड़ दुःखों का,तुम जो बिछुड़ गई।

अब मरे संग साथ चले, ऐसा साथी  कोई नहीं  
जीवन-पथ में रहा अकेला, तुम जो बिछुड़ गई।

किससे मन की बात करु, साथ तुम्हारा रहा नहीं
कैसे अब दिल को बहलाऊँ, तुम जो बिछुड़ गई।

पहले वाली बात नहीं

सब कुछ है पर तुम नहीं   
जीवन में सुख चैन नही 
  दिन कटता है रीता-रीता     
    सपनों वाली रात नहीं।

 ठाट-बाट छूटा जीवन से    
  होठों पर मुस्कान नहीं 
  जीवन की मैं सुध-बुध भुला       
  काया का भी साथ नहीं।

आँखों में अब रात गुजरती      
प्यार भरे दिन रहे नहीं
जीवन फिर से हरा बने
  अब ऐसी बरसात नहीं।

मौजो के दिन बीत गए
सुख के सागर रहे नहीं
दर्द भरा अब जीवन मेरा  
     पहले वाली बात नहीं।

प्यार भरे पैगामों में

एक दिन तुमने कहा था--
मोहब्बत कब मरी है
वह तो मरने के बाद भी
अमर रही है

सदियाँ गुजर गई
लेकिन ताजमहल में
मोहब्बत आज भी ज़िंदा है
हीर-रांझां, लैला-मजनू का प्यार
आज भी अमर है

आज जब भी
मैं तुम्हारी तस्वीर को देखता हूँ
यादों का खजाना खुल जाता है
मेरी नज़रों में

मैं खो जाता हूँ
गुलाबी नरम सपनों में
रुबरु होती है तुम्हारी यादें
जैसे तुम बसी हो मेरे दिल में

तुम तो आज भी जीवित हो
मेरे मन के किसी अदृश्य कोने में
सितारों पर लिखे प्यार भरे पैगामों में

तुमने ठीक ही कहा था--
मोहब्बत कब मरी है
वह तो मरने के बाद भी
सदा अमर ही रही है।

घूँघट की आड़ में



घूँघट की आड़ में
तुम्हारा मुस्कराना
बारिश के मौसम में
छत पर भीगना
तुम्हारी यादें

गुदगुदाती रातों में 
शरारत भरी मुस्कराहटें 
पायल वाले पांवों की
खनकती आहटें
तुम्हारी यादें

चंचल चितवन की 
शोखभरी अदाएं
मखमली पलकों पर
बिखरी-बिखरी जुल्फें
तुम्हारी यादें

शबनम से होंठ
झील सी गहरी आँखें
फूल सी मुस्कराहट
नाज़नीन से अंदाज
तुम्हारी यादें

जंगल से भी धनी हैं तुम्हारी यादें 
मेहंदी, पायल, काजल, बिंदी में 
मैंने आज भी सहेज रखी है 
तुम्हारी यादें। 

गुरुवार, 22 नवंबर 2018

सूख गया नयनों का पानी

ओ सावन के कारे मेघा, जाकर देना उसको पाती   
 बेटे- बहुएँ याद कर रहें, याद कर रही पोती रानी।         

                        बच्चे  दादी - दादी करते,  बहता नयनों  से पानी                    
           पास बैठा कर उनको अब, कौन सुनाएं रोज कहानी।           

 मीठी-मीठी लौरी गाकर, पोती रोज सुलाया करती                                                                                            परियों की बातें बतलाती, बात नहीं है बहुत पुरानी।                                                                                                        
दरवाजे पर गुड़ खाने को, आ जाती है धौली - काली   
 कहना उसको याद कर रही, अंगना की तुलसी रानी।

शाम ढले मंदिर की घण्टी,  प्रभु की महिमा जब गाती                                                                                       कहना उसको याद कर रही, घर की दीया ओ  बाती।                                                                                                          
    मेरे सुख-दुःख की तुम, मत करना कोई भी बात   
      रोते - रोते सूख गया है, अब मेरे नयनों का पानी।  


तुम्हारे जाने के बाद

जीवन के सुख-चैन लूट गए, तुम्हारे जाने के बाद।
दिल के अरमान बिखर गए, तुम्हारे जाने के बाद।।

   जीवन में उदासी छा गई, तुम्हारे जाने के बाद।
    जिंदगी गम में बदल गई, तुम्हारे जाने के बाद।।

विरह-वेदना सताने लगी, तुम्हारे जाने के बाद।
जुदाई मुझे तड़फाने लगी,तुम्हारे जाने के बाद।।

कुहासा छा गया राहों में, तुम्हारे जाने के बाद।
 खुशियों की शाम ढ़ल  गई, तुम्हारे जाने के बाद।। 
         
 केवल  यादें रह गई, तुम्हारे जाने के बाद।  
 सुहानी रातें रुठ गई, तुम्हारे जाने के बाद।।               
                                                                            
उमंग भरा दिल टूट गया,  तुम्हारे जाने के बाद
    सुहाना सपना बिखर गया, तुम्हारे जाने के बाद।। 

मेरे जीवन में बसंत

जब तक
तुम साथ थी
बसंत आने पर
फूल ही नहीं खिलते थे
खिल जाते थे हमारे दिल भी

गुनगुनाती थी साँसें
मचलते थे नयन
छा जाती थी मादकता
बसंती बयार कर देती थी
हमारे दिलों को सरोबोर
अपनी महक से

बहती तोआज भी है
बसंती बयार
ले आती है मादकता भी
किसी न किसी अमराई से
करा देती है चुपके से
बसंत के आगमन का आभास

लद जाता है
पलाश भी फूलों से
झरने लगती है मंजरी
भी आम्र कुंजों में
ओढ़ लेती है धरा भी
धानी चुनर सरसों से

लेकिन मेरा दिल अब
नहीं बहलता
खिले हुए फूलों से
अमराइयों की खुशबू से
कोयल की कूक से

कोहरा छा गया है
मेरे जीवन के बसंत पर
विरह की चादर ने ढक दिया है
बसंतोत्सव को सदा-सदा के लिए

जीवन का सब कुछ
चला गया तुम्हारे ही संग
रह गया केवल पतझड़
अब मेरे जीवन के संग।

तेरी याद दिलाए रे

फागुन मस्त बयार चली, याद तुम्हारी आए रे
सरसों ने भी ली अंगड़ाई, पोर-पोर महकाए रे।

बाजे ढोल, मृदंग,चंग, आज फिर होली आई रे
   कौन आएगा अब बाहों में,नयन नीर बरसाए रे। 


बिना तुम्हारे कैसे मनाऊं, मैं होली त्त्योंहार रे                                                                                                    
खो गई मेरी हँसी ठिठोली, कैसे खेलु होली रे।  

सब के संग रंग-पिचकारी, सबके हाथ गुलाल रे 
     मैं किस के संग खेलु होली, मेरी झोली खाली रे।     

याद तुम्हारी मुझको आए, कौन अबीर लगाए रे
बिना तुम्हारे मेरे कपड़े, रह गए कोरे के कोरे रे। 

फागुन आया रंग-रंगीला, मन मेरा अकुलाए रे
  हलवा,गुजिया और मिठाई, तेरी याद दिलाए रे।

पिचकारी संग रंग उड़त है, हाथों उड़े गुलाल रे
हर कोने मैं तुमको ढूंढूं, घर आँगन चौबारा  रे।



ममता की मूरत

तुम
बदली बन बरसती रही                                                                                                                       
करती रही प्यार की बरसात
सभी पर

तुम
फूल बन महकती रही 
बिखेरती रही प्यार की खुशबू 
सभी पर

तुम
लोरी बन गुनगुनाती रही
लहराती रही प्यार का आँचल
सभी पर

तुम
किरण बन चमकती रही
लुटाती रही चांदनी
सभी पर

तुम
ममता की मूरत बन झरती रही
बहाती रही स्नेह की धारा
सभी पर।


सांसो में उत्तरना

इस बार चौथ पर
मैं नहीं देख सका तुम्हारे
हाथों की मेहंदी 

तुम्हें बहुत शौक था 
लगाने हाथों में 
मेहंदी 

जब भी तुम लगाती
हाथों में मेहंदी 
मुझे आकर जरूर दिखाती

"बताओ कैसी रची है मेरी मेहंदी' 
अपने हाथों को मेरे सामने कर
तुम बार-बार पूछती 

तुम्हें बार-बार मुझसे 
मुस्कराते हुए पूछना
अच्छा लगता

और मुझे तुम्हारे
हाथों की खुशबू का
सांसो में उत्तरना अच्छा लगता। 

तुम्हारी चंचल यादें

 बड़ी चंचल है तुम्हारी यादें
    वक्त-बेवक्त,गाहे-बे-गाहे
   जब होती मर्जी चली आती है

 न मन के द्वार पर दस्तक देती    
  न दिल को हरकारा भेजती
   न दिमाग की कॉल बेल बजाती        

          न सुबह-शाम देखती
              न रात-दिन देखती
      पलक झपकते ही चली आती है           

      न आने का कोई अंदेशा
                   न कोई सन्देशा
               न ही कोई इशारा

           आती है अचानक ऐसे  
          जैसे खामोश झील में
       डाल दिया हो किसी ने कंकड़         

     जैसे कान्हा के मन्दिर में
              अचानक किसी ने
                 बजा दी हो घंटियाँ   
          
           तुम्हारी चंचल यादों की   
              भीनी-भीनी खुशबु
      छा जाती है दिलो दिमाग में।

विरह का दर्द

विरह की अगन में दहक रही है जिंदगी
कंपित लौ सा धुँआ दे रही अब जिंदगी।

विरह के आघात को सह रही है जिंदगी
रातों के नेह स्पर्श से दूर है अब जिंदगी।

 विरह के दुःखों से कंटक भरी है जिंदगी
अधरों की मुस्कान खो चली अब जिंदगी।

विरह की वेदना से फ़साना बनी हैं जिंदगी
  टूटी हुई पतवार सी लगती है अब जिंदगी।

विरह के दर्दों को जिए जा रही है जिंदगी    
पर  कटे  पंछी सी लगती है अब  जिंदगी।   

 विरह के  विशाद में घुल रही  अब जिंदगी
  बिन पानी मीन सी तड़फ रही अब  जिंदगी।

मीठी स्मृतियाँ

एक धरोहर के रूप में
अंतहीन यादें हैं तुम्हारी
मेरे पास  

तुम्हारे जाने के बाद भी 
वो छाई हुई है
मेरे अंतश मन के पास 

समुद्र के किनारे सीपियां चुनना 
गंगा के घाट पर दीपक तैराना 

झाड़ियों से मीठे बैर तोड़ना
खेतो में मोर का नाच देखना

घूँघट की आड़ में
तिरछी नज़रों से झाँकना

होली पर रंग लगाना
दीवाली में मेहंदी रचाना 

गर्मी की रातों में छत पर सोना
दबे पांव आकर आँखें बंद करना

  न जाने कितनी यादें हैं 
कहाँ से शुरु करुं 
और कहाँ अंत करुं

रिमझिम फुहारों सी है
तुम्हारी यादें
जब भी मुझे छूती है
जेठ की गर्मी में भी
   सावन सा सुख देती है।

मेरी जिंदगी में

सूरज की रोशनी बन
तुम जगमगाई
मेरी जिंदगी में

चाँद की चांदनी बन
तुम मुस्कराई
मेरी जिंदगी में

फूलों का सौरभ बन
तुम महकी
मेरी जिंदगी में

सावन की बरखा बन
तुम बरसी
मेरी जिंदगी में

प्यार का गीत गुनगुना
तुम तराना बनी
मेरी जिंदगी में

एक बार लौट आओ
फिर से सारी खुशियाँ
भरने मेरी जिंदगी में।

मुझे तुम याद आई

सतरंगी बौछारें लेकर, रंगीली होली आई 
बासंती वसुंधरा देख,  मुझे तुम याद आई।

                                                      रंग, अबीर और गुलाल, उड़ाती होली आई 
                                                      होली के रंग -चंग देख, मुझे तुम याद आई।                                         

प्रेम रंग की भर पिचकारी, लेकर होली आई
कोयल की मल्हार सुन, मुझे  तुम याद आई।
        
                                                       हूरियारों की टोली, जब रंग ले कर आई
                                                       हाथों में गुलाल देख, मुझे तुम याद आई।

राग-रंग और चुहलबाजी, लेकर होली आई 
फिजा में  बिखरे रंग देख, मुझे तुम याद आई।

                                                    सात  रंग और सात स्वर,  लेकर होली आई
                                                   रंग भरी पिचकारी देख, मुझे तुम याद आई।

यादों की नाव

मेरी स्मृति में
आज भी ताजा है वे दिन
जब हम ढलती सांझ में
गंगा किनारे बंधी नाव में
जाकर बैठ जाते थे

गंगा की लहरों पर
हिचकोले खाती नाव में
शीतल  हवाओं के झोंके
मन को शकुन देते थे

कितनी बातें करते थे हम
अंत नहीं था बातों का
रात घिर आती लेकिन
बातें ख़तम नहीं होती थी

गीता भवन के
दरवाजे बंद होने की
घंटी सुन कर ही हम
लौटते थे अपने कमरे में

आज जब भी
तुम्हारी याद आती है
आँखों में उतर आती है गंगा
चल पड़ती है यादों की नाव।

तुमने बहुत छोटा जीवन जीया

उस दिन तुमने अपनी
नारी-जन सुलभ चातुरी से
मेरी नादानी को बिसरा दिया

चली गयी तुम मुझे बिना बताये
अपने सामने मेरी आँख से
आँसूं भी नहीं गिरने दिया

वैसे अच्छा किया तुमने
वरना तुम वैधव्य का जीवन
सहन भी नहीं कर पाती

बहुत कठिन होती यह राह
क्या तुम विछोह का दर्द
सहन कर पाती ?

तुम तो बिना मांग भरे
और बिना बिंदी लगाए
एक दिन भी नहीं रह पाती

नित नयी रंग-बिरंगी
साड़ियाँ पहने वाली क्या तुम
सफ़ेद साड़ी पहन पाती

मुझे दुःख केवल इस बात का है
कि इस बड़े युग में भी तुमने
बहुत छोटा जीवन जीया।

मेरी आँखों में सावन-भादो उतर गया

मेरे जीवन में कोई उल्लास नहीं रहा
           मेरे जीवन में कोई मधुमास नहीं रहा
                   मेरे जीवन का स्वर्णिम सूरज डूब गया
                          मेरी आँखों में सावन-भादो उतर गया।


मेरे जीवन में खुशियां की सौगात नहीं रही
         मेरे जीवन में पायल की झनकार नहीं रही
                   मेरे जीवन का मंगल गान बिसर गया
                         मेरी आँखों में सावन-भादो उतर गया।


मेरी पलकों में सुनहरा स्वपन नहीं रहा
        मेरे होठों पर प्यार भरा गीत नहीं रहा
                मेरा हमसफर जीवन राह में बिछुड़ गया
                        मेरी आँखों में सावन-भादो उतर गया।


मेरे जीवन में अधरों का हास नहीं रहा
        मेरे जीवन में गीतों का सार नहीं रहा                                   
                 मेरे जीवन से सुख का कारवाँ गुजर गया
                          मेरी आँखों में सावन-भादो उतर गया।                     

तुम अगर आओ तो

तुम अगर आओ तो
आज भीगने चले
बारिश की बौछारों में

तुम अगर आओ तो
आज संग-संग दौड़े
हँसती हरियाली में

तुम अगर आओ तो
आज बाग में घूमने चले
भौंरों के गुंजारों में

तुम अगर आओ तो
आज प्यार बरसाए
चमकती चांदनी में

तुम अगर आओ तो
आज मिलन गीत गाऐं
बासंती हवाओं में

तुम अगर आओ तो
आज झूलों पर झूले
सावन की बहारों में।

आज भी बसी हो मेरी यादों में

कौन कहता है
कि तुम चली गई
तुम तो आज भी बसी हो
मेरी यादों में

मेरी साँसों में
मेरे दिल में और
अब तो तुम आने लगी हो
मेरे जज्बातों में

तीन साल से
तुम्हीं ही तो छाई हुई हो
मेरी कविताओं में

अगले जन्म में
तुम फिर मिलना
मोहब्बत का फूल लिए
हाथों में

मेरे जैसा दीवाना
भला कहाँ मिलेगा तुम्हें
इस बेगानी दुनियां में।

मोहब्बत की डोर

जैसे हवा
रहती है हर जगह
वैसे ही अब तुम रहती हो

हवा दिखाई नहीं देती
लेकिन अपने होने का
अहसास करा देती है

कभी दरवाजे को
हल्का सा थपथपा कर
तो कभी पेड़ की पत्तियों को
थोड़ा सा सरसरा कर

तुम भी हवा की तरह
थिरकती रहती हो
मेरे चहुँ ओर

कभी निकल जाती हो
बगल से छू कर
तो कभी बिखर जाती  हो
खुशबू बन कर

दिल खिल जाता है
हो जाता है दिप- दिप
लगता है झूमने
तुम्हारी खुशबू में डूब कर

सन्दली हवाओं के
धागों से आज भी बंधी है
हमारी मोहब्बत की डोर।

अब कहूँ तो भी क्या ?

जीवन के सफर में हम दोनों संग-संग चले                                  
तुम चली गई छोड़ कर, अब कहूँ तो भी क्या ?       

           तुम तो अब आओगी नहीं मेरे संग में हँसने       
       मैं हँस कर जमाने को दिखाऊँ, तो भी क्या  ?

ढलती उम्र में बेसहारा कर चली गई तुम                                                                                                         
बिखर गए सारे अरमान, कहूँ तो भी क्या ?

      अश्क आँखों से ढलते रहते हैं दिन-रात
       बिखर गई जिंदगी, अब कहूँ तो भी क्या ?

मेरा बहारों भरा गुलसन वीरान हो गया   
आँखों से बरसता है सावन, कहूँ तो भी क्या ?            

मैं प्रतीक्षा करता रहा तुम्हारे लौट आने की
 तुम नहीं आई लौट कर,अब कहूँ तो भी क्या ?

तुमने कहा था

एक बार तुमने कहा था
जब मैं चिर निंद्रा में
विलीन हो जाँउगी
तो यह मत समझ लेना कि
मैं तुमसे दूर चली जाऊँगी

मुझे पाने के लिए
अपने दिल के भीतर झाँकना
मैं तुम्हें वहीं मिल जाऊँगी
मैं कहीं भी चली जाऊँ
तुम्हारे दिल में सदा बसी रहूँगी

आज तन्हाई की बेला में
मैंने जैसे ही तुम्हें याद किया
तुम चली आई मेरी यादों में
पलकों को बंद करते ही
तुम समा गई मेरे ख्यालों में

तुमने सच ही कहा था
तुम सदा मेरे दिल में बसी रहोगी
मेरे मन के अदृश्य कोने में
तुम सदा जीवित रहोगी।

तुम याद आओगी

 गंगा दशहरा पर हम हरिद्वार जाते थे साथ-साथ
अब कभी हरिद्वार जाऊंगा तो तुम याद आओगी।

          दुनियाँ को घूम कर देखा था हम ने साथ-साथ
            अब कभी घूमने जाऊंगा तो तुम याद आओगी।

छुट्टियों में गांव घूमने जाते थे हम साथ - साथ
अब कभी गाँव जाऊंगा तो तुम यादआओगी।

पिछले सावन खेत में भीगे थे हम साथ-साथ
 अब जब  खेत जाऊंगा तो तुम याद आओगी।

शादी की स्वर्ण-जयंती मनाई थी साथ-साथ
अगली साल गिरह पर तुम याद आओगी।

जीवन के राह-सफर में हम चले थे साथ-साथ
  अब जीवन की सुनी राहों में तुम याद आओगी।

समा जाओ मेरी बाँहों में

सरसों झूम रही है खेतों में
आम्र मंजरी महक उठी है बागों में            
 अनुरागी भंवरा ढूंढ़ रहा है कलियों को                 
कोयलियां कुक रही है कुंजों में       

       मुस्करा कर ऋतुराज 
भर रहा है बसंत को बाहों में 
     रंग-बिरंगे फूल खिले हैं
          बाग़ और बगीचों में  
     
           बसंती चादर ओढ़
   सरसों झूम उठी है खेतों में     
    लताऐं कर रही पेड़ों का आलिंगन                
  गौरैया फुदक रही है आँगन में         

          लौट आओ तुम भी
              मदमाते बसंत की बहारों में              
     आकर एक बार फिर से
        समा जाओ मेरी बाँहों में।     

मेरी आँखों में ख्वाब नहीं है

तुम्हारा स्नेह स्पर्श पाकर
                      मन में प्यार का दीप जलता
                                     हैत का सागर हिलोरें लेता  
                                                                                      अब वह स्नेह स्पर्श नहीं है                                                                                                                  मेरी आँखों में कोई ख्वाब नहीं है।     

जब-जब तुम मुस्कुराती 
                        अधरों पर प्यार का गीत उभरता 
                                             सावन कजरी गाने लगता  
                                                               अब वह मादक मुस्कान नहीं है
                                                                                   मेरी आँखों में कोई ख्वाब नहीं है।     
                                                                                    

तुम्हारे तन की उन्मादक गंध
                   मेरे गीतों में मादकता भरती 
                                       दिल में प्यार के फूल खिलाती
                                                        अब वह उन्मादक गंध नहीं है
                                                                             मेरी आँखों में कोई ख्वाब नहीं है।

                                                                            
                                                                             
     तुम्हारे नयनों की छवि देख     
                       कजरारे बदरा पर गीत उमड़ते 
                                          होठों पर झूलों वाले गीत मचलते 
                                                             अब वह पलकों की छांव नहीं है
                                                                                  मेरी आँखों में कोई ख्वाब नहीं है।

                                                                                                
                                                                                             
तुम्हारे पायल के स्वर से
                              भंवरों के गुंजन सा गीत निकलता
                                              सावन श्यामल धन बन छा जाता
                                                              अब वह पायल का संगीत नहीं है
                                                                                मेरी आँखों में कोई ख्वाब नहीं है। 

जब तक तुम साथ थी

जब तक तुम साथ थी
मन में खुशियों के
फूल खिला करते थे
अब तो दुःखों के बादल
छाए हुए हैं।

जब तक तुम साथ थी
जीवन सुहाना सफर
लगता था
अब तो जीवन गुजरा हुवा
कारवां लगता है।

जब तक तुम साथ थी
आँखों में सुख की नींद
बसा करती थी
अब तो आँखों से केवल
अश्रु बहते हैं।

जब तक तुम साथ थी
होठों पर प्यार भरे गीत
मचलते थे
अब तो केवल
दर्द भरी आहें निकलती है।

जब तक तुम साथ थी
दिन सोने के और रातें
चांदी की होती थी
अब तो दिन रेगिस्तान और
रातें पहाड़ लगती है।

दिल के झरोखे में

आज अकेला
सुनी संध्या में
उदास मन को बहलाने
झांकने लगा तुम्हारी
अलमारी में

अचानक शादी की
पचासवीं वर्ष-गाँठ पर पहनी
तुम्हारी साड़ी
आ गयी मेरी नज़रों में

साड़ी को छुआ
तो लगा जैसे तुम समाई हो
उसके रोम-रोम में

तुम्हारी देह की
संदली सौरभ समा गई
मेरे पोर-पोर में

लगा जैसे अचानक
कहीं से आकर तुमने मुझे
भर लिया हो बाँहों में

मैं अपलक निहारता रहा
तुम्हारी साड़ी को
तुम्हारी कंचन काया की छवि
छाने लगी मेरी यादों में

चलचित्र की तरह
उस रंग भरी शाम की
तस्वीरें तिरने लगी आँखों में

नयनों से बहने लगे अश्रु
सारी उदासी बह गई
बस गया तुम्हारा प्रेम
मेरे दिल के झरोखे में।



हर कोई तुमसा क्यों नहीं होता



तुम्हारे बिछुड़ते ही मेरी उम्र ढलने लग गई      
तुम रहती तो उम्र  का अहसास नहीं होता।

                                               मेरे सुरमई धुप वाले दिनों का अंत हो गया 
                                              अब मुझ से प्यार भरा गीत नहीं गाया जाता।  

तुम्हारे विछोह का दर्द रातों में रुलाता है मुझे          
भीगता रहता है तकिया पर दीदार नहीं होता।              

   भरी बहारों में तुम मुझे छोड़ कर चली गई        
     तुम रहती तो जीवन में पतझड़ नहीं आता ।         

 तुम्हारे जाते ही खुशियों की शाम ढल गई        
 बहते हैं आँखों से अश्रु दर्द कम नहीं होता।            

एकाकी जीवन जीना बड़ा कठिन हो गया    
 अब मुझे से तुम्हारा वियोग सहन नहीं होता।    
          
तुम्हारा निश्छल प्रेम मुझे सदा याद रहेगा         
सोचता हूँ हर कोई तुमसा क्यों नहीं होता।          

तुम्हारी यादें - हाइकु

यादें गरजे
सावन की घटा सी
आँखें बरसे।

यादों का पंछी
मन के पिंजरे में
फड़फड़ाए।

सावन झूमा
यादों ने गाठें खोली
जिया तड़फा।

पहली वर्षा
संग-संग भीगना
तुम्हारी यादें।

बिना रोए ही
बहे आँखों से आँसूं
तुम्हारी यादें।

दिल में बसी
आँसुओं में ढलती
तुम्हारी यादें।

छलक आती
पलकों से बदली
तुम्हारी यादें।

सहेज रखी
मन के अल्बम में
तुम्हारी यादें।

जिन्दगी वही थी

जिस समय को हमने
एक दूजे के संग में जीया
जिन्दगी वही थी

भले ही उन लम्हों को
हमने हँसते हुए जीया
या एक दूजे की बाँहों में जीया
लेकिन जिन्दगी वही थी

भले ही उन क्षणों को
हमने हाथों में हाथ डाले जीया
या आँखों में आँखें डाले जीया
लेकिन जिन्दगी वही थी

भले ही उस वक्त को
हमने उलझी अलकों को
सुलझाने में बिताया
या एक दूजे के पहलू में जीया
लेकिन जिन्दगी वही थी

उगते सूरज के साथ
चमकते चाँद के साथ
टूटते तारों के साथ
जो पल हमने साथ-साथ जिए
असल में जिन्दगी वही थी।

तुम्हारी ये तस्वीरें

सुनहली तारीखों को
आभामय और अविस्मणीय
बनाए रखने हेतु तुम सदा
संजोये रखती थी तस्वीरें

अभिनव सोच थी तुम्हारी
बड़े जतन से सहज कर
रखा करती एल्बम में
सारी तस्वीरें

पचास वर्ष के संगसफर में
हमारे प्रेम और विश्वास ने
जो अमृत रस घोला
उसी की साझेदार हैं ये तस्वीरें

कितने रंग भरे थे हमने
अपने जीवन में
उन्ही की मीठी यादें हैं
ये तस्वीरें

मेरी स्मृतियां जैसे ही
लिपटती है तस्वीरों के संग
बोलने लग जाती है तस्वीरें

तुम्हारे विच्छोह के
गम को दूर करने
आज मेरा सहारा बनी है
तुम्हारी ये तस्वीरें।

बुधवार, 21 नवंबर 2018

बुढ़ापा

तुम्हारे जाते ही
बिना निमंत्रण के
आहिस्ता-आहिस्ता
हौले-हौले मेहमान बन
आ धमका मेरे पास बुढ़ापा

ढलने लगा चमकता तन
टूटने लगा मजबूत मन
डिगने लगा आत्मविश्वास
अवांछित होने का अहसास
कराने लगा बुढ़ापा

घुटनों में दर्द
आँखों में धुंधलापन
कानों से ऊँचा सुनाई देना
दाँतों का एक-एक कर विदा होना
अंग-प्रत्यंग पर अपना असर
दिखाने लगा बुढ़ापा

अपनों से ही
बात करने के लिए तरस जाना
चुप रह कर सब कुछ सुनना
एक खालीपन का अहसास
कराने लगा बुढ़ापा

मेहमान आते है
दो-पांच दिन ठहर कर
चले जाते हैं

लेकिन यह तो इतना ढीठ है कि
अब जाने का नाम तक नहीं लेता
अब तो मेरे तन के साथ ही
जाएगा बुढ़ापा।

क्षमा अवश्य माँगूंगा

जब भी घड़ी दो घड़ी
फ़ुरसत में होता हूँ
घेर लेती हैं तुम्हारी यादें

कानों में गूँजने लगती है
तुम्हारी बातें और
आवाजें

एक चलचित्र की तरह
मानस पटल पर
छा जाती है तुम्हारी बातें

शब्द नहीं मिलते
लिखने उन यादों को
जीता रहता हूँ अहसासों में

आँखों से झरते रहते हैं आँसू
दिल से निकलती रहती है
टीस भरी आहें

काश! अंत समय
मैं तुम्हारे पास रहता
दो बात तो कर ही लेता

तुम्हें भी संतोष रहता
मैं अंत समय तक
तुम्हारे साथ था

जब भी मिलूंगा
तुमसे इसके लिए
क्षमा अवश्य माँगूंगा।

आज भी याद आती है

जिंदगी के राहे-सफर में, तुम मुझे छोड़ चली गई


तुम्हारी प्यार भरी मुस्कान,आज भी याद आती है।

                                                        तुम्हारा दर्पण सा रुप, ओ चन्दन महकती देह  
                                                        संगमरमरी बाहों की, आज भी याद आती है।

तुम्हारा अनन्त प्रेम ओ प्यार भरा स्नेह स्पर्श 
कंचन सी काया की, आज भी याद आती है।                                          
                                                                                  
                                                      
                                                      तुम्हारी पायल की रुनझुन, ओ बिच्छियों की खनक                                                               कोयल सी मीठी आवाज की, आज भी याद आती है।       
                                                   
तुम्हारे मेहंदी लगे हाथ, ओ काजल लगे नैन  
लहराती जुल्फों की, आज भी  याद आती है।                        
                                                     
                                                            तुम्हारी प्यार भरी बातें ओ शोख भरी अदाऐं
                                                             हिरनी सी आँखों की, आज भी याद आती है।