रविवार, 18 नवंबर 2018

थोड़ी मृत्यु मुझे भी आई है

सूर्य का प्रकाश
कमरे से लौट रहा है
शाम का धुंधलका
अपने पंख फैला रहा है

मैं अकेला कमरे में
लौट आया हूँ
तुम्हारे संग बिताए
लम्हों को ढूंढ रहा हूँ

तुम्हें याद करते ही
आँखों से अश्रु छलक आते हैं
तुम्हारी एक झलक पाने को
मेरे नयन तरस जाते हैं

तुम्हारी यादों की नदी
मेरे अन्दर बहुत गहरी बहती है
मधुर स्मृतियों की लहरें
मेरे विरह के घावों को
सहलाती रहती है

मैं तुम्हारी यादों के छोरों को
अपने संग जोड़ता रहता हूँ
रात  के सन्नाटे में
टुकड़े-टुकड़े सोता हूँ

मेरी जिंदगी की सारी खुशियाँ
तुम्हारे संग चली गई है
तुम्हारी मृत्यु के साथ
थोड़ी मृत्यु मुझे भी आई है।

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