रविवार, 18 नवंबर 2018

म्हारी काळजा री कौर कठै गई

आभा उड़ती कुरजा सागै
थूं भेजती संदेशो
काळजै री कोरां मांय थारै
झबकती ओळूं'री बिजलियाँ
वा मोत्यां मूंघी मूळक कठै गई 
म्हारी काळजा री कौर कठै गई। 


मेड़ी चढ़ हरख अर उमाव सूं उडीकती
दरवाजै री औट स्यूं गैळ मांय झाँकती
म्हनै देख' र हरख उमड़तो 
थारै हाथा री चूड़ियाँ री झणकार मांय 
वा हरख-उमाव आज कठै गई
म्हारी काळजा री कौर कठै गई।


डागळा सूं थूं उड़ावंती काला काग
हैत भरिया हीयै स्यूं गांवती अमीणा गीत
आखी रैंण करती हर'रा बिड़द बखाण 
दीवळा रै च्यानण लिखती हैत'रा संदेसा
वा हैत-प्रीत री डोर आज कठै गई
म्हारी काळजा री कौर कठै गई

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